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Class 9 (SSC)Hindi (Lokbharati / Sulabhbharati)2026-27 Syllabus

Chapter 6 निसर्ग वैभव (पूरक पठन) Solutions

Complete Maharashtra State Board Balbharati & Yuvakbharati textbook solutions for Chapter 6 निसर्ग वैभव (पूरक पठन). Step-by-step solved exercises, numerical problems, and digest answers.

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Maharashtra State Board Class 9 Hindi Lokbharti Solutions Chapter 6 निसर्ग वैभव (पूरक पठन)

Hindi Lokbharti 9th Std Digest Chapter 6 निसर्ग वैभव Textbook Questions and Answers

पठनीय :

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
निम्न शब्द पढ़िए। शब्द पढ़ने के बाद जो भाव आपके मन में आते हैं वे कक्षा में सुनाइए।

कल्पना पल्लवन :

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
किसी कार्यालय में नौकरी पाने हेतु साक्षात्कार देने वाले और लेने वाले व्यक्तियों के बीच होने वाला संवाद लिखिए।
Solution & Step-by-Step Answer:
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Solution & Step-by-Step Answer:

पाठ के आँगन में :

1. सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए :

प्रश्न क.
संजाल

उत्तर:

प्रश्न ख.
कविता की पंक्तियों को उचित क्रमानुसार लिखकर प्रवाह तत्जा पूर्ण कीजिए।
1. परिचित मरकत आँगन में
2. अभिशापित हो उसका जीवन?
3. अनिल स्पर्श से पुलकित तृणदल
4. निश्चल तरंग-सी स्तंभित

उत्तर:

2. कविता द्वारा प्राप्त संदेश लिखिए।

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
कविता द्वारा प्राप्त संदेश लिखिए। उत्तरः प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि ने मनुष्य के हृदय में प्रकृति प्रेम उत्पन्न करने का प्रयास किया है। प्रकृति में चारों ओर सौंदर्य भरा पड़ा है और उस सौंदर्य की अनुभूति कराने के लिए मनुष्य को प्रकृति की ओर जाना चाहिए। मनुष्य को प्रकृति से हमेशा खुश एवं प्रसन्न रहने की प्रेरणा लेनी चाहिए। मनुष्य को एक-दूसरे से नफरत नहीं करनी चाहिए। उसे अपने मन से क्षुद्र भावों को त्यागकर प्रकृति की भाँति विशाल हृदय रखना चाहिए। मानव के मन से वैश्विक प्रेम व परोपकार की भावना साकार करना ही इस कविता का उद्देश्य है।

3. कविता के तृतीय चरण का भावार्थ सरल हिंदी में लिखिए।

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
कविता के तृतीय चरण का भावार्थ सरल हिंदी में लिखिए।
Solution & Step-by-Step Answer:
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Solution & Step-by-Step Answer:
पर्वत जीवन पर बिखरी हुई प्राकृतिक सुषमा का आनंद लूटते समय कवि को सहज ही एक बात याद आ जाती है। वह यह कि जड़ जीवन में यानी प्रकृति में अपार सौंदर्य भरा पड़ा है पर मानव जीवन में दुख का भाव क्यों है? उसका मन विषण्णता से भरा क्यों पड़ा है? अत: कवि मनुष्य को कहता है कि, उसे प्रकृति से सीख लेनी चाहिए। उसे मानव प्रकृति का पुन: संश्लेषण-विश्लेषण करना चाहिए। देखा जाए तो मनुज ईश्वर का प्रतिनिधि है फिर भी उसका जीवन अभिशापित है। शायद इसलिए कि उसे क्षुद्र अहंकार रूपी भावना ने दिन-रात घेरा हुआ है। इसी कारण वह विश्व चेतना से दूर चला गया है और वह अकेला पड़ गया है।

श्रवणीय :

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
नीरज जी द्वारा लिखित कोई कविता यू ट्यूब पर सुनिए और उसके केंद्रीय भाव पर चर्चा कीजिए।

भाषा बिंदु :

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
निम्नलिखित मुहावरे या कहावतों में से अनुपयुक्त शब्द काटकर उपयुक्त शब्द लिखिए।
Solution & Step-by-Step Answer:
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Solution & Step-by-Step Answer:

Hindi Lokbharti 9th Answers Chapter 6 निसर्ग वैभव Additional Important Questions and Answers

(क) पद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए।

कृति (1) आकलन कृति

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
समझकर लिखिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

प्रश्न 2 Maharashtra Board Solution
समझकर लिखिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

प्रश्न 3 Maharashtra Board Solution
संजाल पूर्ण कीजिए। उत्तरः

कृति (2) स्वमत अभिव्यक्ति

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
‘आपका देखा हुआ प्राकृतिक स्थल’ इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
Solution & Step-by-Step Answer:
ः प्राकृतिक स्थल पर घूमने जाने का मला ही कुछ और है। मैंने कौसानी की यात्रा की थी। कौसानी उत्तराखंड में स्थित एक प्राकृतिक स्थल है। चारों ओर हरियाली व सघन वृक्षों को देखकर मानव मन प्रफुल्लित हो जाता है। रंग-बिरंगे फूल और आस-पास मैंडराने वाले भौरे देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। कोहरा हट जाने पर कौसानी से हिमालय के दर्शन होते हैं। श्वेत बर्फ की राशि देखकर मानव मन बाग-बाग हो जाता है। सचमुच धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो बस वह कौसानी में ही है।

(ख) पद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए।

कृति (1) आकलन कृति

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
समझकर लिखिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

प्रश्न 2 Maharashtra Board Solution
कृति पूर्ण कीजिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

प्रश्न 3 Maharashtra Board Solution
प्रस्तुत पद्यांश पढ़कर ऐसे दो प्रश्न तैयार कीजिए कि जिनके
Solution & Step-by-Step Answer:
निम्न शब्द हों i. साँझ ii. नीले
Solution & Step-by-Step Answer:
i. पर्वतों की घाटियों में कौन छिप जाती है? ii. छाया कौन-से रंग की है?

कृति (2) स्वमत अभिव्यक्ति

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
‘प्रकृति अपने अनंत हाथों से मनुष्य पर उपार करती आ रही है।’ इस कथन की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। उत्तरः प्रकृति साक्षात ईश्वर का दूसरा रूप है। प्रकृति मानव पर उपकार करती आ रही है। नदी, तालाब, सागर, पेड, फूल-फल, जंगल, पहाड़, पवन, सूर्य की किरण ये सब प्रकृति के अंश हैं। इनके माध्यम से प्रकृति ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है और दे रही है। मनुष्य को जीवन जीने के लिए अन्न, पानी एवं अन्य मूलभूत वस्तुएँ प्रकृति से ही मिलती है। मनुष्य को साँस लेने के लिए जिस प्राणवायु की जरूरत होती है वह भी प्रकृति से ही प्राप्त होती है। आयुर्वेदिक दवाएँ प्रकृति से मिलती हैं। अतः प्रकृति अपने अनंत ह्यथों से मनुष्य पर उपकार करती आ रही है। यह विधान पूर्णत: सत्य है।

(ग) पद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए।

कृति (1) आकलन कृति

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
आकृति पूर्ण कीजिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

प्रश्न 2 Maharashtra Board Solution
कृति पूर्ण कीजिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

प्रश्न 3 Maharashtra Board Solution
सत्य-असत्य लिखिए। i. पक्षी फल चखना शुरू कर देते हैं। ii. गिलहरियाँ फूलों को कुतरना शुरू कर देती है।
Solution & Step-by-Step Answer:
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Solution & Step-by-Step Answer:
i. सत्य ii. असत्य

कृति (2) स्वमत अभिव्यक्ति

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
‘पर्वतीय जीवन में अनोखा व अद्भुत आनंद भरा होता है।’ इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। उत्तरः पर्वतीय प्रदेश सभी को अच्छे लगते हैं। सभी पर्वतीय प्रदेशों की यात्रा करना पसंद करते हैं। पर्वतीय प्रदेशों का आरोह व अवरोहण करना सभी को भाता है। पर्वतीय प्रदेश में चारों ओर हरियाली होती है। बड़े-बड़े वृक्ष एवं उन पर कलरव करने वाले पक्षियों को देखकर हमारे आँखों की तृप्ति हो जाती है। पर्वतीय प्रदेशों में बहने वाली हवा शीतल होती है। वह मानव के मन में अद्भुत प्रेरणा निर्माण करती है। पर्वतीय प्रदेश मानव हृदय को उमंग, ताजगी व उल्लास से भर देते हैं। अत: पर्वतीय जीवन में अनोखा व अदभुत आनंद भरा होता है।

(घ) पद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए।

कृति (1) आकलन कृति

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
कृति पूर्ण कीजिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

प्रश्न 2 Maharashtra Board Solution
कृति पूर्ण कीजिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

प्रश्न 3 Maharashtra Board Solution
समझकर लिखिए।
Solution & Step-by-Step Answer:

कृति (2) स्वमत अभिव्यक्ति

प्रश्न 1 Maharashtra Board Solution
‘मानव प्रकृति से दूर चला जा रहा है।’ क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? अपने विचार लिखिए।
Solution & Step-by-Step Answer:
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Solution & Step-by-Step Answer:
जी हाँ, आज मानव प्रकृति से दूर चला जा रहा है। विज्ञान एवं तकनीकी के इस युग में मानव ने भले ही आसमान को छू लिया है। फिर भी प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर उसने धरती को सौदर्यहीन कर दिया है। मानव ईया, दवेष, जलन, नफरत एवं अहंकार के कारण इतना स्वार्थी हो गया है कि वह प्रकृति के एहसान को भी भूल गया है। अपना स्वार्थ पूर्ण करने के लिए मानव एक-दूसरे का लहू बहाने से भी पीछे नहीं हटता है। अपनी इच्छाएं पूर्ण न होने के कारण वह हृदय से विषण्ण एवं दुखी हो जाता है। प्रकृति में सर्वत्र सौदर्य बिखरा हुआ है। इस तथ्य को भी वह भूल जाता है। अत: स्पष्ट है कि मानव प्रकृति से दूर चला जा रहा है।

निसर्ग वैभव Summary in Hindi

कवि-परिचय :

जीवन-परिचय : सुमित्रानंदन पंत का जन्म २0 मई 1900 को कौसानी उत्तराखंड में हुआ था। आप प्रकृति के सुकुमार कवि थे। आप छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक हैं। आपको प्रकृति ने ही कविता लिखने की प्रेरणा दी थी। आपको साहित्य के सर्वश्रेष्ठ ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
प्रमुख कृतियाँ : काव्य संग्रह – ‘वीणा’, ‘गुंजन’, ‘पल्लव’, ‘ग्राम्या’, ‘चिदंबरा’, ‘कला और बूढ़ा चाँद’ आदि, उपन्यास – ‘हार’.
आत्मकथात्मक संस्मरण – ‘साठ वर्ष : एक रेखांकन’

पद्य-परिचय :

कविता : भावों का आविष्कार कराने वाली, हृदय में आनंद की अनुभूति निर्माण कराने वाली एवं रस का साक्षात्कार कराने वाली साहित्य की विधा ‘कविता’ कहलाती है। कविता मनुष्य के भावों की सहज अभिव्यक्ति है।

प्रस्तावना : प्रस्तुत कविता में महाकवि पंत जी ने प्राकृतिक सुषमा का बड़ा ही मनोहारी एवं अद्भुत वर्णन किया है। प्रकृति के प्रत्येक अंश में सौंदर्य भरा पड़ा है। उस अनुभूति का एहसास मनुष्य को तभी होगा जब वह प्रकृति की ओर आकर्षित होगा।

सारांश :

प्रस्तुत कविता प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति मनुष्य के मन में आकर्षण निर्माण करती है। प्रकृति में ही ईश्वर का अंश विराजमान है, इस तथ्य को साकार करने वाली यह रचना है। महाकवि पंत जी प्रकृति के पुजारी थे। उन्होंने इस कविता के द्वारा प्रकृतिरम्य अनुभूति का साक्षात्कार तो करवाया ही है साथ में प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करते समय आध्यात्मिकता की ओर पाठकों का ध्यान खींचकर उन्हें दुख, दर्द, व्यथा, नैराश्य एवं विषण्णता आदि पर विचार करने के लिए भी विवश कर दिया है।

प्रकृति के कण-कण में अपार सौंदर्य भरा पड़ा है। देखा जाए तो प्रकृति जड जग का अंश है और मानव जीवन तो चेतन जग का रूप है। फिर भी मानव जीवन में सर्वत्र विषण्णता छायी हुई है। ऐसा क्यों? मनुज को ही स्वयं इसका उत्तर ढूँढ़ने के लिए कवि ने विवश कर दिया है। इसीलिए यह कविता छायावाद का एक अनुपम उदाहरण है।

भावार्थ :

कितनी सुंदरता बिखरी ………………. वन प्रिय कोयल!
पंत जी प्रकृति के सुकुमार कवि थे। वे जानते हैं कि प्रकृति जगत में सौंदर्य बिखेरने वाला ईश्वर ही है। अतः कवि ईश्वर को संबोधित करते हुए कहते हैं, “हे ईश्वर ! प्राकृतिक जगत में सुंदरता बिखरी हुई है। पहाड़ों की चोटियों पर फैली सूरज की धूप घाटी की ओर लोट रही है और उसके डाँव में स्वयं को चुपचाप लिपटाए हुई है। धूप और छाँव का मानो मिलन हो रहा है। “हवा सर्वत्र बह रही है। उसके स्पर्श से हरी घास पुलकित यानी रोमांचित हो गई है। नदी मधुर संगीत का गान करती हुई स्वच्छंद बह रही है। प्रतिदिन प्रकृति की अनुपम शोभा का आनंद वन-भू उठा रही है।”

“चारों ओर लाल रंग के फूल खिले हुए हैं। फूलों का लाल रंग ज्वालाओं का निर्माण कर रहा है। उन्हें देखकर मनुष्य के आँखों की तृप्ति होती है यानी मनुष्य के आँखों को ठंडक मिलती है। भौरे भी अपने दल के साथ आकर गुंजन कर रहे हैं। वे फूलों की कलियों पर बैठकर अपने होंठों से मधु पान कर रहे हैं। लाल रंग के फूलों ने तितलियों को भी अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। वे भी फूलों पर मंडरा रही हैं। ऐसे में दूर किसी पेड़ की पत्तियों की छाँव में बैठकर वन प्रिय कोयल रुक-रुककर अपना गीत गा रही है।”

लेटी नीली ………………. कर संध्यावंदन!
कवि पंत प्रकृति की सुषमा का वर्णन करते हुए कहते हैं, “आसमान में सर्वत्र नीले रंग के बादल दिखाई दे रहे हैं। इसी कारण नीले रंग की छाया दिखलाई पड़ती है। इस नीले रंग की छाया ने सूर्य के किरणों को अपने आप में समा लिया है। सूर्य के किरणों का सुनहरा रंग नीली छाया के साथ एकाकार हो गया है। इस विहंगम दृश्य को देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि नीले व सुनहरे रंग का आवरण निश्चल तरंग की तरह आसमान में निर्माण हुआ है।

ऐसे में सवेरा होने से पहले सर्वप्रथम सुनहरी किरण सर्वत्र छा जाती है। मानो उसका अभिनंदन करने के लिए ऊषा तैयार हो जाती है। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए साँझ भी उत्सुक रहती है। इसीलिए वह वहीं आकर छिप जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऊषा निर्जन वन में संध्या को भी वंदन करती है।”

अपलक तारापथ ………………. मरकत आँगन में!
कवि पंत कहते हैं, “संध्या के बाद रात्रि का समय शुरू हो जाता है। आसमान में बिना पलक झपकाए असंख्य तारे दिखाई देने लगते हैं। उनके साथ चंद्रमा भी आसमान में आ जाता है। उस पूर्ण रूप में आसमान में बहुत की सुंदर तारे दिखलाई देने लगते हैं। ऐसा लगता है मानो वह एक दर्पण ही हो जिसमें असंख्य तारे अपने आप को निहार रहे हों। रात्रि के समय पर्वतों पर बहने वाली हवा भी पर्वतों के कंधों पर सो जाती है। पर्वतों पर दिखाई देने वाली यह प्राकृतिक सुषमा सभी को सम्मोहित कर देती है।

सचमुच पर्वत जीवन में अद्भुत एवं अनोखा विस्मय भरा पड़ा हुआ है। रात्रि के पश्चात फिर से सवेरा हो जाता है। पक्षी फल चखना शुरू कर देते हैं। गिलहरियाँ नए पत्तों को कुतरना शुरू कर देती हैं। धरती रूपी रत्न पर सभी वन-पशु प्रसन्न दिखाई देने लगते हैं।”

स्वाभाविक ………………. मानव मन निश्चित!
पर्वत जीवन पर बिखरी हुई प्राकृतिक सुषमा का आनंद लुटते समय कवि को सहज ही एक बात याद आ जाती है। वह यह कि जड़ जीवन में यानी प्रकृति में अपार सौंदर्य भरा पड़ा है पर मानव जीवन में दुख का भाव क्यों है? उसका मन विषण्णता से भरा क्यों पड़ा है? अतः कवि मनुष्य से कहते हैं कि उसे प्रकृति से सीख लेनी चाहिए। मनुष्य को प्रकृति का संश्लेषण-विश्लेषण करना चाहिए। देखा जाए तो मनुष्य ईश्वर का प्रतिनिधि है फिर भी उसका जीवन अभिशापित है। शायद इसलिए कि उसे क्षुद्र अहंकार रूपी भावना ने दिन-रात घेरा हुआ है। इसी कारण वह विश्व चेतना से दूर चला गया है और वह अकेला पड़ गया है।

शब्दार्थ :